वज्रेश्वरी देवी- एक भव्य शक्तिपीठ


भारतीय संस्कृति में माँ को विशेष महत्व दिया गया है; इसलिए नवरात्रों का विधान किया गया है। सभी को माँ से कल्याणकारी प्रार्थना करनी चाहिए। उत्तर भारत में माँ दुर्गा के वज्रेश्वरी धाम( जिसे आप सभी नगरकोट वाली माता के नाम से परिचित हैं) के प्रति लोगों में विशेष श्रद्धा है। अतः आज मैं आपको माँ दुर्गा के इस पावन धाम के विषय में बताऊंगा। 

काँगड़ा मन्दिर परिसर

🚩🚩🚩🚩🚩जय माता दी।🚩🚩🚩🚩🚩🚩

भौगोलिक स्थिति:-

यह शक्तिपीठ हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित है। यहाँ से चामुण्डा देवी मन्दिर20 किलोमीटर और ज्वालामुखी मन्दिर 35 किलोमीटर की दूरी पर है।

माँ वज्रेश्वरी देवी मन्दिर, काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश                               


पौराणिक महत्व:-

जब दक्ष प्रजापति के यज्ञ विध्वंस के बाद जब सती ने यज्ञाग्नि में स्वयं को समर्पित किया तब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर घूमे। शिव जी का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खण्ड खण्ड कर दिया। शरीर के जो भाग जिस स्थान पर गिरे, वह स्थान शक्तिपीठ कहलाये।मान्यता है कि इस स्थान पर माता का वाम वक्षःस्थल गिरा। 

नगरकोट वाली माता


मन्दिर का वास्तुशिल्प:-

माता का यह मन्दिर शिखर शैली में निर्मित है। इसके आगे गुम्बदनुमा मण्डप है। मन्दिर के स्तम्भ घट पल्लव शैली के हैं। जबकि प्रवेश द्वार पर चाँदी के पतरों से मढ़ा हुआ है और इस पर विभिन्न देवी देवताओं को उत्कीर्ण किया गया है।

धर्म चबूतरा  

चांदी के प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण प्रतिमा 

चांदी के प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण प्रतिमा 

चांदी के प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण प्रतिमा 


मन्दिर परिसर में लगभग 40 प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं जोकि सातवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक के बीच की हैं।

अठारह भुजाओं वाली देवी

जय माँ काली









इतिहास की दृष्टि में:-

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में वज्रेश्वरी और ज्वालामुखी देवी का वर्णन किया है।उसके अनुसार नगरकोट की देवी की प्रसिद्धि बहुत थी। इस मन्दिर के अनेक नाम जैसे:- स्वर्ण मंदिर, जगदीश्वरी, भवन, नगरकोट धाम और वज्रेश्वरी इत्यादि आए हैं।

मन्दिर परिसर में


आततायी महमूद गजनवी द्वारा 1009 में मन्दिर पर आक्रमण किया गया। उसने अपार सम्पत्ति को लूटा। इतनी अपार सम्पत्ति को ले जाने के लिए घोड़े खच्चर भी कम पड़ गए थे । नगरकोट का किला 1043 ई0 तक महमूद गजनवी के नियंत्रण में रहा।

दिल्ली के राजा महिपाल ने महमूद गजनवी से बदला लेकर यवनों से मन्दिर को मुक्त कराया।


इसके बाद 1337 में मुहम्मद तुगलक ने,1365 में फिरोज शाह तुगलक ने, 1363-86 के मध्य शहाबुद्दीन ने, 1540 में शेरशाह सूरी के सेनापति ख्वास खान ने अपार सम्पत्ति को लूटा।

24 अगस्त 1809 को महाराजा रणजीत सिंह ने काँगड़ा पर अधिकार कर मन्दिर को संरक्षण दिया।

4 अप्रैल 1905 को भूकम्प में मन्दिर ध्वस्त हो गया। परिसर में केवल तारा देवी का मन्दिर ही बचा रहा, जिससे इस स्थान का महत्व और बढ़ गया।

माँ तारा देवी 

माँ तारा देवी मंदिर


भूकम्प के बाद पुनर्निर्माण हुए मन्दिर का डिजाइन वृन्दावन के गोविंद जी मन्दिर की तरह है।

प्रसाद वितरण:- 

श्रद्धालुओं के लिए दोपहर12 बजे से 2 बजे तक तथा रात्रि को 8 बजे से 9 बजे तक लंगर परोसा जाता है।


प्रसाद वितरण स्थान


कैसे  पहुंचे – यहां पहुंचने के लिए पठानकोट से जोगिंदरनगर जाने वाली खिलौना गाड़ी (टॉय ट्रेन)  से यात्रा की जा सकती है। पठानकोट से कांगड़ा तीन घंटे का रास्ता है। या फिर आप पंजाब में होशियारपुर से कांगड़ा बस से भी जा सकते हैं। कांगड़ा रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी दो किलोमीटर है। मंदिर पुराने कांगड़ा शहर के मध्य में स्थित है।

पठानकोट छावनी, रेलवे स्टेशन

काँगड़ा मन्दिर, रेलवे स्टेशन



अक्षरामाता जल प्रपात
गणेश प्रतिमा (ग्यारहवीं शताब्दी)

मुख्य मन्दिर के सामने प्रतीक्षा करते श्रद्धालु

   
प्राचीन भैरव प्रतिमा:-
                          कहते हैं कि यह प्रतिमा दशवीं शताब्दी की है। जब भी क्षेत्र में कोई भी दैवीय आपदा
, भूकम्प आदि आता है तब भैरों जी के नेत्रों से आँसू और शरीर से पसीना निकलना आरम्भ हो जाता है।

सर्पमाला धारण किये भैरों (दशवीं शताब्दी)

जय माता दी

मनोज कुमार झा"मनु"
घुमक्कड़पथिक

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
बहुत सुंदर गुरू जी

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