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मथुरा संग्रहालय ----गौरवशाली अतीत को समेटे हुए

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भारत का इतिहास हजारों वर्ष प्राचीन है। उस गौरवशाली अतीत के दर्शन करने की इच्छा हो तो भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा पहुँच जाएं। यहाँ आप राजकीय संग्रहालय में प्राचीन मूर्तिकला के अद्भुत दर्शन कर सकते हैं। मथुरा हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म का बड़ा केन्द्र रहा है। यह योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण और सातवें जैन तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ की जन्मभूमि रही है । महात्मा बुद्ध के चरण भी इस धरती पर पड़े हैं। स्थिति:-          यह उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के डेम्पियर नगर में स्थित है। स्थापना:-            इसकी स्थापना तत्कालीन जिलाधिकारी एफ एस ग्राउस ने 1874 में की। तब यह कचहरी के पास एक छोटे से भवन में था। 1930 में संग्रहालय को वर्तमान भवन में लाया गया। संग्रहालय विशेष :---                  संग्रहालय में आप मौर्यकाल, शुंग काल, कुषाण काल और गुप्तकाल की मथुरा शैली में बनी मूर्तियां देख सकते हैं। यहाँ प्रवेश करते ही आपको मुस्कुराते हुए बुद्ध की विशाल प्रतिमा के दर्शन करेंगे। मुस्कुराते हुए महात्मा...

पाताल खेड़िया ---शिवपुत्र कार्तिकेय जी की जन्मस्थली

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 किवदंती है कि यह शिवपुत्र कार्तिकेय जी की जन्मस्थली है। तथा कुमार कार्तिकेय ने यहीं पर ताड़कासुर का वध करने के पश्चात प्रायश्चित किया था। शिवपुत्र कार्तिकेय जी की जन्मस्थली स्थिति:-           यह स्थान अलीगढ़ मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर तहसील इगलास के गांव सहारा खुर्द के पाताल खेड़िया में है। एक नहीं तीन शिवलिंग-----              पुराणों के अनुसार, ताड़कासुर को वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु शिवपुत्र के हाथों होगी। अतः कार्तिकेय ने  उस राक्षस का वध कर ऋषि मुनियों को उसके आतंक से मुक्त किया । ताड़कासुर के आतंक से मुक्ति तो मिल गयी किन्तु कार्तिकेय जी को जब यह विदित हुआ कि वह शिवभक्त था, तब उन्होंने प्रायश्चित करने का निर्णय लिया और भगवान विश्वकर्मा जी के द्वारा तीन शिवलिंग कुमारेश्वर, प्रतिज्ञेश्वर और कपिलेश्वर की स्थापना की। इनके अलग अलग मन्दिर कुछ दूरी पर देखे जा सकते हैं। सभी शिवलिंगों की ऊंचाई 4-5 फुट है। एक अन्य नाम गुप्त तीर्थ स्थल            कहा जाता है कि जब कार्...

इगलास का मराठा किला-- धरोहर का बुरा हाल

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मेरे गृहनगर अलीगढ़ में एक तहसील है- इगलास। कम ही लोग जानते हैं कि यहाँ एक किला बना हुआ है, जिसे मराठों का किला कहा जाता है। किले ने दिया इगलास को नाम इस किले का निर्माण ग्वालियर के संस्थापक महादाजी सिन्धिया ने 1762 ईसवी में कराया। उस समय फ़ारसी भाषा का प्रयोग होने के कारण यहाँ जो दरबार लगता था(जिसे फारसी में इजलास कहते थे।) 1802 में अंग्रेजों ने इस किले पर लार्ड लेक के नेतृत्व में अधिकार प्राप्त कर लिया। अंग्रेज इजलास को IGLAS लिखते थे जो हिंदी में इगलास लिखा जाने लगा। इसप्रकार इसका नाम इगलास हो गया। 1857 की क्रान्ति में गहलऊ के वीर अमानी सिंह ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। जब मैं इसे देखने पहुंचा तो चारों ओर गन्दगी तथा आसामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा दिखाई दिया। किले की दीवार दरक रहीं हैं किंतु कोई इस विरासत को बचाये रखने के लिए गम्भीर नहीं हैं। मराठा काल में न्याय का मन्दिर कहलाने वाला किला आज मौन है, बदहाल है, बेबस है और प्रतीक्षा कर रहा है जीर्णोद्धार की। मनोज कुमार झा"मनु" अलीगढ़ उत्तर प्रदेश भारत